वो जो मैं था


वो जो मैं था 
कुछ ऐसा था 
अब क्या कहूँ कैसा था। 

मेरी हसीं से समां बंध जाता था 
मैं यूँ ही हस्ता हसाता 
जैसे कुछ आवारा सा था

अकेला तो था पर
मेरे साथ रहता मेरी किस्मत का तारा था। 

छत्त पे यूँ ही तारो को देख्ता
किताबो के पन्नो मैं
मोमबत्ती की रौशनी में
मेरे पास कहानियों का पिटारा था। 

वो शामें, वो छत्त,
दोस्त, यार
कड़ाके की ठण्ड मैं 
यूँ ही बातों बातों मैं 
मैंने कई बार देखा 
शाम से सुबह का नज़ारा था। 

एक छत्त, एक कमरा,
कभी डब्बा, कभी ढाबे का खाना
अप्ना भी क्या आशियाना था। 

अकेला था,
पर मेरे साथ रहता,
मेरी किस्मत का तारा था। 

हाँ ....बस था 
मैं ..
जो बस था
। 

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